पुरूषार्थ ही जीवन हैं |

ओउम्

यह संसार पुरूषार्थीयों के लिए हैं| पुरूषार्थ ही जीवन हैं, प्रमाद ही मृत्यु हैं| जीवन में सफलता भाग्यवाद पर नही अपितु पुरूषार्थवाद पर निर्भर करती हैं| प्रतिपल की सजगता, जागरूकता के साथ जो आगे बढ़ते हैं, वे अपने जीवन में नीचे गिरने व भटकने से बच जाते हैं|

सफलता के सूत्र

सफलता की यात्रा मन में निरंतर उत्साह की पराकाष्ठा माँगती हैं| प्रथम तो एक उत्साह, एक उमंग की लहरे हमारे भीतर हिलोरे मारनी चाहिए|

दूसरा, सफलता उसे प्राप्त होती हैं जिसका जीवन संकल्पवान हैं| संकल्पो से रहित जीवन दिशाहीन व निरूत्साही होता हैं | संकल्प वही हैं जिसमें अब और कोई विकल्प नही हैं | अत: जब हम अपने जीवन में ऐसे संकल्प कर चूकें हो तो समय अब सोचने का नही, करने का हैं, क्योंकि समय आबाध गति से निकले जा रहा हैं और हमारा जीवन हवा के पत्ते की तरह हैं जिसे कब, कौन सा पवन का एक झोंका उड़ा कर ले जाए यह कोई नही जानता|

हमारा लक्ष्य, हमारा ध्येय, हमारी मंजिल पूकार रही हैं इसलिए उद्देश्य अब सिर्फ चिंतन में, विचारो में नही, अपितु क्रिया में होना चाहिए| यही संसार के सफल व्यक्तियों की पहचान हैं| संसार में जहां पर भी जो व्यक्ति सफल दिख रहा है उस की सफलता का कारण उसका प्रबल व सत्त पुरूषार्थ, अपार उत्साह, पूर्ण सजगता, अखण्ड संकल्प, समय प्रबंधन ही हैं | अत: संस्कृत की युक्ति सार्थक हैं –

                                                                          वीर भोग्या वसुन्धरा |

वीर, पुरूषार्थी, संघर्षशील मनुष्य ही इस पृथ्वी पर भोग करते व विजय होते हैं ना कि कायर, कमज़ोर, भीरू, बुजदिल, निरूत्साही व्यक्ति| इसलिए ऐ संसार! के कायर,कमज़ोर दिशाहीन लोगो ! सूनो उपनिषद के ऋषि भी हमे संदेश देते हुए कह रहे हैं –

                                                                    उतिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत् |

उठो! जागो! और तब तक मत रूको जब तक तुम्हे अपने जीवन का लक्ष्य प्राप्त न हो जाए| यह संसार एक रणक्षेत्र हैं, यह जीवन एक संग्राम हैं, इसलिए कमर कस कर खड़े हो जाओ और मन में उठने वाली आलस्य, प्रमाद, लक्ष्य से भटकाने वाली शत्रु रूपी वृत्तियो का मान मर्दन करो और इस संसार समर से विदा लेने के पूर्व ही कृण्वन्तो विश्वार्यम का उदघोष चरित्रार्थ करो |

इति ओउम् शान्ती

प्रांशु आर्य

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