गर्व योग्य नाम (भाग २)

हिन्दू शब्द पर स्वामी विवेकानन्द के विचार –

    हिन्दू नाम त्यागने का परामर्श केवल स्वामी दयानन्द ने ही नहीं दिया, स्वामी विवेकानन्द को भी इस पर आपत्ति थी | उन्होंने अपने एक व्याख्यान में इस प्रकार कहा  –

  “ जिस हिन्दू नाम से परिचित होना आज कल हम लोगों में प्रचलित है, इस समय उसकी कुछ भी सार्थकता नहीं है, क्योंकि उस शब्द का केवल यह अर्थ था – सिन्धु नदी के पार बसने वाले । प्राचीन पारसियों के गलत उच्चारण से यह सिन्धु शब्द ‘हिन्दू’ हो गया है । वे सिन्धु नदी के इस पार रहने वाले सभी लोगों को हिन्दू कहते थे, इस प्रकार हिन्दू शब्द हमे मिला है | फिर मुसलमानों के शासन काल से हमने अपने आप यह शब्द अपने लिए स्वीकार कर लिया था | इस शब्द के व्यवहार करने में कोई हानि ना भी हो, पर मैं पहले ही कह चुका हूँ कि अब इसकी कोई सार्थकता नहीं रही, क्योंकि तुम लोगों को इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि वर्तमान समय में सिन्धु नदी के इस पार वाले सब लोग प्राचीन काल की तरह एक ही धर्म को नहीं मानते।”  – – – – – – – – – – – – – –

अतः मैं हिन्दू शब्द का प्रयोग नहीं करूँगा | तो हम किस शब्द का प्रयोग करे ? हम वैदिक अथवा वेदान्ती शब्द का प्रयोग कर सकते हैं |

                                                   – स्वामी विवेकानन्द (भारतीय व्याख्यान – प्रकाशक – रामकृष्ण मिशन, धन्तोली, नागपुर महाराष्ट्र दि 01-07-2001)

जो लोग किसी शास्त्र को और स्वामी दयानन्द की बात स्वीकार न करके स्वामी विवेकानन्द को ही परम प्रमाण स्वीकारते हैं, उनके लिए उक्त उदहारण दिया गया है | यहाँ स्वामी विवेकानन्द नें आर्य शब्द स्वीकार न करके वैदिक या वेदान्ती नाम रखने का परामर्श दिया है । आर्य शब्द कहते तो वह स्वामी दयानन्द की बात का ही समर्थन हो जाता । अतः अपनी अलग ढपली बजाई है । वास्तव में वैदिक या वेदान्ती कहने से बात नहीं बनती क्योंकी ये शब्द एक धर्म विशेष या मान्यता विशेष वालों के लिए रूढ़ हो चुके हैं । इससे जो वैदिक धर्मी या वेदान्ती नहीं हैं वे अलग – थलग पड़ जायेंगे।  यथा – जैनी, बौद्ध, शैव, चार्वाक आदि नास्तिक मत वाले अपने को हिन्दू वैदिक या वेदान्ती नहीं मानते हैं परन्तु आर्य मानते हैं । इसलिए स्वामी दयानन्द का विचार और परामर्श ही शास्त्र सम्मत, इतिहास सम्मत और प्रमाणिक है, उसे ही स्वीकारने में बुद्धिमत्ता है, अन्य कोई मार्ग नहीं ।

वास्तव में हिन्दू शब्द भारतीय भाषा परम्परा में नहीं है । यह विदेश से आया है अतः विदेशी भाषा का है । कुछ लोगों का कहना है कि संस्कृत के सिन्धु शब्द से ही ‘हिन्दू’ सि को हि करके बना है । बना होगा, परन्तु हमारा दावा है कि भारत मे कभी नहीं बना । किसी भी प्राचीन इतिहास में हमारा हिन्दू या सिन्धु नाम जाती के रूप में उपलब्ध नहीं होता । किसी भारतीय भाषा में भी सिन्धु से हिन्दू नहीं हुआ । भारतीय भाषाओं में पद का आदि ‘स’ कभी ‘ह’ नहीं हुआ । स्वामी वेदानन्द तीर्थ का कहना है कि “सिन्धु से हिन्दू बनने की बात तो इतनी अनर्गल व्यर्थ और पोच है कि इस पर विचार करना भी अपने समय का नाश करना है । देखिए जिस सिन्धु नदी के कारण आप देश का नाम हिन्दू होना मानते हैं, वह आज सिन्धु ही बनी हुई है, वह हिन्दू नहीं बनी । और सिन्ध प्रान्त भी जहाँ मुसलमानों ने सब से पहले आक्रमण किया था, आज भी सिन्ध बना हुआ है, हिन्द न बन सका । अतः आपका यह कहना है कि सिन्धु से हिन्दू बना, नितान्त असंगत और सर्वथा निराधार अतएव निस्सार है।”

दूसरा प्रमाण लीजिए, बाबर के मित्र ने पत्र लिखा जिसमें उसने सिन्ध और हिन्द पर विजय पाने के लिए परमात्मा को धन्यावद देने को कहा है । जैसे – दयालु प्रभु की दया के लिए सैकडों धन्यवाद दो, क्योंकि उसने तुझे सिन्ध, हिन्द और सैकडों राज्य दिये हैं । (देखें – कोल माल्कसन लिखित पुस्तक अकबर पृ. 38 की टिप्पणी) इसी प्रकार तारीख फिरोजशाही में गयासुद्दीन तुगलक के सम्बन्ध में लिखा है कि, हिन्द, सिन्ध के समस्त देश तथा पूर्व और पश्चिम के सारे राजा और सेनापति अनेक वर्षों तक उसके डर से कांपते रहे । यहाँ स्पष्ट ही सिन्ध के साथ हिन्द दो पृथक् – पृथक् पद हैं । यदि सिन्धु से हिन्दू बना होता तो यहाँ कभी सिन्ध के साथ हिन्द शब्द का प्रयोग न होता । एक साथ इन दोनों शब्दों का प्रयोग सिद्ध करता है कि हिन्दू शब्द का सिन्धु से कोई सम्बन्ध नहीं है।

हिन्दू शब्द फारसी आदि भाषाओं का है उन भाषओं के कोषों और कवियों के व्यवहार से इस शब्द के निम्नलिखित अर्थ ज्ञात होते हैं – चोर, डाकू, गुलाम, बटमार, काफिर, तलवार, कालाकलूटा, मनहूस और अशुभ । ‘अरबी’ भाषा में भी यह शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त होता हैं । (देखें पुस्तिका – हमारा नाम आर्य है । (ले. स्वामी वेदानन्द तीर्थ पृ. 15, 16 प्रकाशक – विरजानन्द वैदिक संस्थान गाजियाबाद)

कई विद्वानों के अनुसार फारसी भाषा में ‘स’ को ‘ह’ उच्चारण किया जाता है अतः सर्वप्रथम फारसियों ने सिन्धु को हिन्दू कहा और उन्होंने ही हमें हिन्दू नाम से सिन्धु देश के निवासी अर्थ में पुकारा | परन्तु यदि ऐसा होता तो फारसी के शब्द कोष में इसका उल्लेख होना चाहिए था जबकि ऐसा नहीं है | फारसी शब्द कोष ‘ गया सुल्लुगात ’ में हिन्दू शब्द का अर्थ काला, काफिर, चोर, बदमाश, बटमार, मस्सा और छछुन्दर लिखा हुआ है । यह नहीं लिखा कि दरियाए हिन्द के उस पार के बाशिन्दे । अतः हमारे विचार से पारसियों में यह शब्द मुख्य रूप से काले अर्थ में ग्रहण किया गया था । अरबी में भी यह इसी अर्थ में सर्वप्रथम प्रचलित हुआ । अरब लोग गुलाम रखा करते थे जो वे अबीसीनिया से लाते थे, वहाँ के लोग काले होते हैं अतः उन्ही को अरबों ने हिन्दू कहना प्रारम्भ किया  जो पहले काले पश्चात् गुलाम अर्थ का वाची हुआ । अरब और फारस (ईरान) वाले भारतीयों की काला समझते थे अतः हिन्दू शब्द का प्रयोग काले लोगों के देश के अर्थ में सर्वप्रथम उन्होंने किया । बाद में जब मुसलमानों ने यहां आक्रमण किया और यहां के लोगों को गुलाम बनाया तब बाकी के सारे अर्थ आरोपित कर दिए ।

हमारे देश के कुछ भाग में यथा मुम्बई और गुजरात तथा इनके समीपस्थ स्थानों में जो स को ह बोलने का चलन है, वह पारसियों के वहाँ आकर बसने के बाद उन्हीं के संसर्ग से चला है, वहाँ की भाषा में यह विकार नहीं है | भारतीय विद्या भवन मुम्बई के इतिहास विभाग के प्राध्यापक प्रो. शिवदत्त ज्ञानी एम.ए. ने  एक पुस्तक लिखी है जिसका नाम है ‘भारतीय-संस्कृति’ । यह पुस्तक उक्त संस्था ने ही प्रकाशित की है । इस पुस्तक के चौथे अध्याय का शीर्षक है ‘हिन्दू या आर्य’ | इस अध्याय का प्रारम्भ यों होता है- “आज हमारा देश हिंदुस्तान के नाम से जाना जाता है, तथा हम लोग ‘हिन्दू’ नाम से सम्बोधित किये जाते हैं |” साथ ही एक पक्ष इस बात का भी समर्थन करता है कि यह नाम हमारे लिए सांस्कृतिक तथा एतिहासिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं है | हमारा प्राचीन नाम आर्य है, हमारा देश आर्यावर्त व भारतवर्ष कहलाता था । अतएव हमें चाहिए कि हम ‘हिन्दू व हिंदुस्तान’ के स्थान पर ‘आर्य’ आर्यावर्त व भारतवर्ष स्वीकार कर लें | वास्तविक रूप में हमारे समाज में आर्य शब्द से किसी को घृणा नहीं था । आर्य समाज के प्रादुर्भाव के पश्चात उसके विरोधियों  ने आर्य शब्द का विरोध करना आरम्भ कर दिया | परिणाम स्वरुप आज हमारे सामने विवाद उपस्थित है कि हम अपने को आर्य कहें या हिन्दू? निष्पक्ष भाव से इस प्रश्न पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होगा कि मुस्लिम आक्रमणों से पूर्व हमारे पूर्वज अपने को आर्य ही कहते थे, तथा इस देश को ‘आर्यावर्त’ या ‘भारतवर्ष’ । संस्कृत साहित्य में ‘हिन्दू’ नाम का उल्लेख नहीं आता है । कुछ लोग इस शब्द को ऋगवेद से सिद्ध करने का यत्न करते हैं । उनके अनुसार वैदिक कालीन आर्य जिस देश में रहते थे उसका नाम– ‘सप्त सिन्धु’ हफ्त हिन्दू हुआ, बाद में हिंदुस्तान व हिन्दू आदि शब्द बन गए । किन्तु इस सिद्धान्त के लिए ऐतिहासिक, सहित्यिक आदि कोई भी प्रमाण नहीं है । भाषा शास्त्र के नियमों से भी यह सिद्ध नहीं किया जा सकता । इसके पश्चात् विद्वान् लेखक ने मनुस्मृति, समुद्र गुप्त के स्तम्भ लेख (प्रयाग) विभिन्न पुराणों, राज शेखर की काव्य मीमांसा और संस्कृत के नाटकों से प्रमाण उद्धृत करके सिद्ध किया है कि इनमें आर्य, आर्यावर्त और भारतवर्ष का ही उल्लेख किया गया है, हिन्दू या हिंदुस्तान या सप्त सिन्धु का उल्लेख कहीं भी प्राप्त नहीं होता । हिन्दू शब्द का ऐतिहासिक विवेचन करते हुए लेखक ने लिखा है कि हिन्दू शब्द पारसियों और अरबों की देन है । मुसलमानों के भारत में आने के पश्चात् ही आर्यों को हिन्दू नाम दिया गया है । अंत में लिखता है कि – “आर्यवर्त” उस प्राचीन काल की स्मृति दिलाता है जब कि आर्य संस्कृति का सूर्य निकल रहा था । आर्य ऋषि अपने आत्मिक विकास के द्वारा वैदिक ऋचाओं के दर्शन कर रहे थे। इस प्रकार आश्चर्यजनक वैदिक साहित्य का निर्माण हो रहा था। ‘आर्यवर्त’ नाम सुनकर ही हमारे मानस चक्षुओं के सामने वैदिक कालीन आर्यों का चित्र खिंच जाता है, जिन्होंने प्राचीन काल में अपनी विजय पताका विश्व के भिन्न भिन्न भागों में फंहराई थी । भारतवर्ष नाम सुविख्यात भरत वंश से समबन्धित है । यह एक ऐसे युग का द्योतक है जबकि आर्य संस्कृति का सूर्य ऊंचा उठ चुका था व उसकी तीव्र किरणें चहुँ ओर फैल रहीं थी । प्राचीन साहित्य का विद्यार्थी भरत वंश के ऐतिहासिक महत्व को भली-भाँति समझ सकता है । यह नाम आर्यों के राजनीतिक विकास का द्योतक है । इस नाम को सुनते ही तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का साक्षात्कार हो सकता है । ‘हिंदुस्तान’ व इंडिया नाम एक ऐसे युग के सूचक हैं, जब इस देश के निवासी अपने सच्चे अस्तित्व को भूल चुके थे । आर्य संस्कृति का सूर्य अस्ताचल के निकट पहुँच रहा था । ये नाम हमारी दासता के सूचक हैं और यह दासता राजनीतिक दासता से ही उत्पन्न होती है । विदेशी नाम और रीति-रिवाजों को अपनाना बताता है कि हमने अपनी सांस्कृतिक श्रेष्ठता को भुला दिया था । विजेताओं के द्वारा पददलित किए जाने पर हम यह भी मान बैठे कि हमारे विजेताओं का सांस्कृतिक प्रभुत्व भी हम पर स्थापित हो चुका है । आज तक इस मनोवृत्ति ने हमारा पीछा नहीं छोड़ा है | यह कहा जा सकता है कि ये नाम हमारे सांस्कृतिक  पतन के द्योतक है ।

सारांश में  यह कहना चाहिए कि वैदिक काल से हमारा नाम आर्य था तथा हमारा देश ‘आर्यवर्त’ ‘भारतवर्ष’ आदि कहाता था | हिन्दू नाम से सर्वप्रथम की ईरानियों ने हमको सम्बोधित किया । अरब, यूनान, चीन आदि देशों के निवासियों ने भी इसी शब्द के भिन्न-भिन्न अपभ्रंशों से हमें सम्बोधित किया । मुसलमान आक्रमणकारियों ने भी इसी नाम को अपनाया । मुस्लिम शासन में हम लोग अपनी संस्कृति से बिछुड़ने लगे व विदेशियों से प्रभावित होकर ‘हिन्दू’ हिन्दुस्तान आदि नामों का प्रयोग करने लगे । किन्तु हमारा परम कर्तव्य है कि हम पहिले के नाम को ही अपनावें, आर्य आर्यवर्त भारतवर्ष आदि नाम हमारें  हृदय में प्राचीन गौरव की दिव्य छटा का आभास करा सकते हैं । राष्ट्रीय भावना की जागृति इन्हीं प्राचीन नामों से ही हो सकती है, न कि विदेशियों द्वारा दिए गए हिन्दू आदि नामों से । प्रत्येक भारतीय को अपने प्राचीन गौरवान्वित नामों को ही अपनाना चाहिए ।

भारत के प्रसिद्ध वैज्ञानिक और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के विज्ञान विभाग के अध्यक्ष रह चुके स्वर्गीय डॉक्टर स्वामी सत्यप्रकाश डी.एस.सी लिखते हैं- “हिन्दू भावना विघटन की प्रतीक है ।  पूजा पद्धति और आस्थाओं की अनेकता के कारण हिन्दू विघटित है | हिन्दू न राष्ट्र का नाम है, न धर्म का, न संस्कृति का । संस्कृति संगठन सूत्रक होती है | हिन्दू विकृतियों में विश्वास करता है, अतः हिन्दुत्व का आंदोलन विघटन और विकृतियों का आंदोलन है । वैदिक संस्कृति समानता और संगठन की संस्कृति है समस्त हिन्दू सम्प्रदायों का इतिहास हमारें विघटन का इतिहास है और इसी लिए आज हमारी मिली-झुली  मिश्रित संस्कृति है ।  हमें संस्कृतियों की मिली-झुली होने पर आपत्ति नहीं है, आपत्ति तो हमें उस संस्कृति पर है जो मनुष्य-मनुष्य में भेदभाव पैदा करने वाली है, जो स्वर्ग, नरक के नए-नए द्वार खोलने वाली है | इसी लिए हिन्दू सम्प्रदाय निष्प्राण ही नहीं देश और राष्ट्र के लिए घातक भी रहे हैं | (देखें – दिनमान अंक 30 अक्टूबर सन 1983 ईस्वी)

हमारे धर्म शास्त्र और संस्कृत तथा प्राकृत ग्रन्थों से सिद्ध होता है कि हमारा नाम आर्य है, और इस देश का नाम आर्यवर्त  तथा भारतवर्ष है | सृष्टि के आदि में तिब्बत से नीचे उतर कर आर्यों ने इस देश को अपना निवास बनाया और इसका नाम आर्यवर्त रखा |

आर्यों से पहले इस देश में कोई नहीं रहता था | जो लोग कहते है कि आर्य कहीं बाहर से आए और यहाँ से द्रविड़ो को मारकर भगा दिया और खुद यहाँ बस गए, यह बात सर्वथा झूठ है | आर्य ही यहाँ के मूल निवासी हैं और द्रविड़ भी आर्य की शाखा है जैसा कि मनुस्मृति और महाभारत में स्पष्ट लिखा है |

शनकैस्तु क्रियालोपादिमा: क्षत्रिय जातयः |
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन चं |
पौण्ड्रकाश्चौड़: द्रविडा: काम्बोजा यावना: शका: |
पारदा पहलवाश्चीना, किराता दरदा: खाशा: ||   ( मनु. १०-४३-४४)

अर्थात् पौण्ड्र, चोल, द्रविड़, काम्बोज, यवन, शक, पारद, पहलव, चीना, किरात, दरद, और खश यह सब क्षत्रिय जातियाँ हैं जो कुत्सितकर्मों के कारण पतित हो गई हैं और ब्राह्मणों से दूर रहने के कारण धर्माचरण भूल गई हैं । अतः द्रविड़ आर्य क्षत्रिय वर्णस्थ लोग हैं । किसी भी संस्कृत ग्रंथ में ऐसा लिखा नहीं मिलता कि आर्य ईरान या मध्येशिया से आए। यह बदमाश विदेशियों का षड्यंत्र है कि उत्तर दक्षिण के निवासियों को लड़ाकर देश को तोड़ा जाय और आर्य को शक्तिहीन बनाए रखकर उनका शोषण किया जाए |
हमारे कर्मकांड का प्रारम्भ संकल्प से होता है उसमें हमारा पुरोहित पुरातन काल से “आर्यवर्ते भरतखण्डे” पढ़ता आ रहा है । आर्यों के आवर्त्तन से इसका नाम आर्यावर्त है | आर्यों ने इसे बसाया अपना निवास स्थान बनाया । “भरत ऋग्वेद में सूर्य का नाम है और इसके प्रभामण्डल को भारत कहते है ।” अतः आर्यावर्त का वह भूभाग जहां आदित्य का प्रभामंडल बरसता है वही भारतवर्ष है | इसके अतिरिक्त विवस्वान (सूर्य) नामक राजा का पुत्र वैवस्वत मनु भी भारत कहलाया और इससे क्षत्रियों का एक विशेषण भारत हो गया | आगे चलकर भरत नामक दुष्यंत का पुत्र प्रतापी सम्राट हुआ उसके वंशज भी भारत कहलाए अतः भारतों का शौर्य, पराक्रम जहाँ बरसे वह भारत वर्ष है |
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण के शब्दों में –
मानस भवन में आर्यजन जिसकी उतारें आरती |
भगवान भारतवर्ष में गूंजे हमारी भारती ||
यह पुण्य भारत भूमि हैइस के निवासी आर्य हैं |
विद्या, सुसंस्कृति सभ्यता में, विश्व के आचार्य है ||(भारत भारती से)

काशी अपर नाम वाराणसी (बनारस) में विश्वनाथ और अन्नपूर्णा के प्रसिद्ध मंदिर हैं | इन दोनों मंदिरों के प्रवेश द्वार पर शिलापट्ट लिखकर लगाया हुआ है जिसमें उत्कीर्ण है कि – आर्येतराणां प्रवेशो निषिद्ध: | अर्थात् आर्यो के अतिरिक्त लोगों का प्रवेश वर्जित है | इससे यह स्पष्ट है कि जब इन मंदिरों का निर्माण हुआ था, तब तक हमारा सम्बोधन आर्य ही था संस्कृत तथा प्राकृत भाषा के धार्मिक, साहित्यिक और ऐतिहासिक ग्रंथों में सर्वत्र आर्य शब्द का प्रयोग प्राप्त है |
गुलाम व्यक्ति और गुलाम राष्ट्र को नाम उसका स्वामी ही प्रदान करता है । वह स्वाभिमान सूचक न होकर अपमान सूचक ही होता है । हमें भी मुसलमानों ने ‘हिन्दू’ और हिंदुस्तान नाम दिया और अंग्रेजों ने इण्डियन और इण्डिया नाम दिया । दोनों ही कुत्सित अर्थ देने वाले हैं । खेद है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के 72 वर्ष बाद तक भी, अभी तक इस देश का एक नाम नहीं हैं। नामों का कभी अनुवाद या ट्रांसलेशन नहीं हुआ करता वे जैसे के तैसे लिखें और बोले जाते हैं । किसी नाम के स्थान पर पर्यायवाची शब्द नहीं रखा जाता । परन्तु दुर्भाग्य से इस देश के नाम का ट्रांसलेशन होता है या नाम के स्थान पर पर्यायवाची का प्रयोग होता है ।  इस देश के शासकों और उनको परामर्श देने वालों की बुद्धि का दिवाला निकल चुका है । यदि किसी का नाम कमलनाथ है तो उसे पंकज स्वामी कह कर संबोधित नहीं किया जाएगा और पर्वत सिंह को  माउण्टेन लायन नहीं लिखा जायेगा । परन्तु हमारे देश को हिन्दी में भारत, अंग्रेजी में इंडिया, उर्दू में हिंदुस्तान कहते हैं । करेन्सी नोट में देख लीजिए मूर्खता के दर्शन हो जायेंगे । अरे ! अंग्रेजी हिन्दी दोनों में भारत लिखने में क्या हानि हो रही है ।
प्रसिद्ध योगी अरविन्द कहते हैं – “आर्य विचार, आर्य अनुशासन, आर्य चरित्र, आर्य जीवन को पुनः प्राप्त करो । वेद और योग को पुनः प्राप्त करो । उन्हें केवल बुद्धि या भावना से नहीं अपितु जीवन द्वारा पुनः जीवित कर दो । उन्हें जीवन में लाओ, बस तुम महान शक्तिशाली अजय तथा निर्भय हो जाओगे ।  तब तुम्हें न जीवन भयभीत कर सकेगा न मृत्यु | ”

हिन्दू समाज, समाज ना होकर एक सड़ा दल-दल है | उसका कोई निश्चित जीवन-दर्शन नहीं बल्कि वह विकृत विचारों का विधिहीन मिश्रण है, जिससे किसी प्रकार का सृजन नहीं किया जा सकता । अतः प्रत्येक हिन्दू को आर्य तथा हिन्दू समाज को आर्य समाज और हिन्दू राष्ट्र के स्थान पर आर्य राष्ट्र बनाना होगा, तभी कल्याण सम्भव है, अन्य कोई मार्ग नहीं है । स्वामी दयानन्द के शब्दों में –
अगर उन्नति करना चाहते हो तो, आर्य समाज के साथ मिलकर उसके उद्देश्य के अनुसार आचरण करना स्वीकार करो अन्यथा कुछ भी हाथ नहीं लगेगा । इसलिए सभी स्वाभिमानी जन अपने पुराने गौरवपूर्ण आर्य नाम को पुनः स्वीकार करें और उसी पर गर्व करें ।

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