आर्य लेखक परिषद् एक परिचय

– आचार्य वेदप्रिय शास्त्री

महर्षि दयानंद प्रज्ज्वलित अग्नि की ज्वाला वांछित आवश्यक समिधा, सामग्री और घृत के अभाव में शनै:-शनै: शीतल होती हुई अपनी पहचान ही खोती जा रही है । वह अग्नि जिसे कभी एंड्रोजैक्सन ने संसार के पाप भस्म कर देने वाली कहा था | आज स्वयं पाप से घिरी बुझने के लिए विवश दृष्टिगोचर हो रही है | प्रश्न यह है कि क्या इसे बुझने देना चाहिए ?

यदि नहीं तो विचार करना होगा कि महर्षि दयानंद का यह यज्ञ विध्वंस क्यों हो रहा है ? इसे कैसे बचाया जा सकता है | इसके लिए पुष्कल समिधा व आहुति द्रव्य कौन जुटाएगा | है कोई माँ का लाल इस अवरुद्ध क्रांति रथ को यथेष्ट गति दे सके | आज उन्हीं वीर पुरुषों की आवश्यकता है | आर्य लेखक परिषद उन्हीं का आह्वान, उन्हीं के अन्वेषण करने के लिए स्थापित की गई है |

मित्रों ! हर युग में, हर समाज में, लेखन की अपनी महत्वपूर्ण भूमिका रही है, भविष्य में भी सदा रहेगी | भाषण, प्रवचन, कविता और गीत जो किसी विचार को प्रचारित-प्रसारित करने के माध्यम हैं, लेखन उन्हें स्थायित्व और दीर्घकालीनता प्रदान करता है | लेखन वीरगाथा काल में होता रहा है, रीतीकाल में हुआ, भक्ति काल में हुआ, पराधीन भारत में हुआ और आज भी हो रहा है | लेखन का अपना-अपना उद्देश्य और अपना-अपना प्रयोजन रहा है | तदनुसार ही समाज की गति में उतार-चढ़ाव आए | बिके हुए लेखक, खुशामदी और चापलूस लेखक, पराधीन भयग्रस्त विवश लेखक, ऐय्याश और कामचोर लेखक अपनी लेखनी से वास्तविकता नहीं लिखते | क्रांति से उन्हें डर लगता है | इनका लेखन समाज के रचनात्मक विकास में बाधा ही उत्पन्न करता है | आर्य लेखक परिषद का उद्देश्य है महर्षि दयानंद की वैचारिक क्रांति को आगे बढ़ाना और महर्षि दयानंद की वैचारिक क्रांति का उद्देश्य है संसार का उपकार करना अर्थात शारीरिक, आत्मिक और सामाजिक उन्नति करते हुए एक स्वस्थ विश्व समाज का निर्माण करना | यह कैसे होगा, यह लिखना और कौन इसमें बाधक है यह लिखना | पारस्परिक राग-द्वेष स्वार्थ आदि छुड़ाकर प्रेम त्याग और बलिदान का भाव जागृत करके क्रांति को संपूर्णता की ओर ले जाने के लिए लिखना |

5 thoughts on “आर्य लेखक परिषद् एक परिचय”

  1. बहुत सुंदर प्रिय मित्र प्रांशु गुप्त आर्य जी।

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